(आलेख : रवीश कुमार)
एसआईआर और वोट चोरी के आरोपों का जवाब नहीं दिया गया। इतने गंभीर आरोप लगे। कई दिनों तक चुप रहने के बाद इसे घुसपैठ से जोड़ा गया, जिसका कोई आधार नहीं। गृह मंत्री ने कहा कि राहुल एसआईआर का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि घुसपैठियों को बचाना चाहते हैं। पिछले साल जून से एसआईआर हो रहा है, गृहमंत्री यहां बता देते कि कितने घुसपैठिए एसआईआर से पहचाने गए हैं। आयोग ही बता देता ! By making ‘Regime Change’ the issue, the BJP is shielding Gyanesh Kumar!
बिहार एसआईआर के समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई निकला भी तो, उसकी जांच की सक्षम अथॉरिटी गृह मंत्रालय है। गृह मंत्री बता सकते हैं कि ऐसे कितने केस उनके सामने आए हैं? नहीं बता रहे हैं।
इसी तरह असम में कई दशक तक घुसपैठ का भूत नचाया गया। सुप्रीम कोर्ट से भी भूत नचवाया गया। कोर्ट ने एनआरसी का आदेश दिया। डेढ़ हज़ार करोड़ से अधिक की राशि फूंक दी गई। इस प्रक्रिया के दौरान कितने लोग मर गए। एनआरसी की लिस्ट बनी, तो लाखों की संख्या में हिंदू भी निकल गए, जिनकी नागरिकता संदिग्ध थी। निकलनी ही थी, क्योंकि किसके पास काग़ज़ होता है!
इस एसआईआर में भी लोग पिछले एसआईआर का सबूत नहीं दे पाए। प्रमाण पत्र के चक्कर में पड़े। अगर विपक्ष ने कोर्ट से लड़कर आधार नहीं जुड़वाया होता, तो आधे वोटर बाहर हो गए होते। लौटते हैं असम के एनआरसी पर। बीजेपी ने एनआरसी को तुरंत फेंका। एनआरसी के बाद असम में जो पहला विधान सभा चुनाव हुआ, उसमें एनआरसी का नाम तक लेना बंद कर दिया। फिर से उसी भूत को एसआईआर के नाम से नचाया जा रहा है कि घुसपैठिया पकड़ा जा रहा है। (Article : Ravish Kumar)
जंतर-मंतर के बाद जेन ज़ी के आंदोलन को दिमाग़ी नक्सल कहा गया, लेकिन क्या हुआ? पेपर तो लीक हो ही रहा था। एनटीए बेकार एजेंसी साबित हुई। परीक्षा में सुधार के लिए नंदन निलेकणी की अध्यक्षता में कमेटी बनानी पड़ी। प्रधान का इस्तीफ़ा तो हुआ ही। मुद्दा भी यही था और आंदोलन पूरी तरह अहिंसक। हिंसा के आरोप पुलिस पर लगे और गृहमंत्री जवाब देने आख़िरी दिन छोड़ कर पूरे मानसून सत्र के दौरान सदन में ही नहीं आए।
एसआईआर से तब भी ध्यान नहीं भटका, तो जंतर-मंतर हटाने और राजधानी ठप्प करने में उलझाया गया। सारी बहस प्रदर्शन के अधिकार की तरफ चली गई, जानी भी थी। उससे भी ज्ञानेश कुमार का मामला पीछे नहीं गया, तो रिजीम चेंज ले आए। ये भी नहीं चलेगा, तो परिसीमन है ही। इसे भारत की सभी समस्याओं का इलाज बताया जाएगा। तभी तो संसद सत्र को ख़त्म घोषित नहीं किया गया है।
इधर आयोग कोर्ट जाने से पहले नाम जोड़ने में लगा है। अब किसी भी तरह से नाम जोड़े जा रहे हैं। एसआईआर में नाम जोड़ देने से ही जवाब पूरा होगा नहीं। बिहार और बंगाल में नाम काटकर वोट देने से रोका गया। यह अवैध काम था। इसे सुधारा नहीं जा सकता है। ये अपराध सुप्रीम कोर्ट और आयोग की नाक के नीचे हुआ है। जिस तरह से जनता के डर से नाम जोड़े जा रहे हैं, उसी तरह से पहले भी जोड़े जा सकते थे। जवाब होगा नहीं, तभी तो चुप हैं।
जनता के बीच चोरी पकड़ी गई, तो बेंच के नीचे कॉपी रख कर जल्दी-जल्दी होमवर्क की कॉपी भर रहे हैं, ताकि आयोग तक जनता के पहुँचने के पहले दिखा सकें कि किसी का नाम नहीं कटा है। फॉर्म 6 में जो अवैध था, उसे तो ख़त्म कर दिया। फॉर्म 7 भी अब एक आदमी दस से ज़्यादा नहीं भर सकता। पहले तो सैकड़ों भर रहा था, तब कहां थे? 27 लाख लोगों से वोट के अधिकार छीने गए, तब कहां थे?
अख़बार में ख़बर छपी कि जेन ज़ी का नाम नहीं जोड़ने के लिए एसआईआर के नाम पर एसएसआर बंद है, तो तुरंत दिल्ली में घोषणा कर दी गई और अब पूरे देश में। इसके बाद जो वोटर लिस्ट आएगी, उसकी मशीन से पठनीय कॉपी दी जाएगी। पहले का वोटर लिस्ट तो ख़त्म हो चुका, उसकी कॉपी आयोग ने नहीं दी। पाक साफ होता, तो वोटर रोल की मशीन पठनीय कॉपी दे सकता था। राहुल गांधी और दूसरे नेता मांगते रहे, नहीं दिया तो नहीं दिया।
इसलिए ‘रिजीम चेंज’ का मुद्दा लाया गया है। इसके जवाब में बातें कही जा रही हैं। ज्ञानेश कुमार के अपराध को बचाने के लिए असंख्य पुलिस बल उतारा गया। मुद्दा और पब्लिक के बीच पहुंच गया। अब रिजीम चेंज के मुद्दे से ज्ञानेश को बचाया जा रहा है। चुनाव आयुक्त सामने आकर जवाब नहीं दे सकते। जवाब होता, तो प्रेस कांफ्रेंस हो जाती। 23 सितंबर से 18 अक्तूबर के बीच दिल्ली में रोज़ प्रेस कांफ्रेंस हुई। केवल चुनाव आयोग की नहीं हुई।
वोट चोरी असली रिजीम चेंज प्रूफ़ काम है। लड़ाई तो इसी की है कि वोट का अधिकार छीना गया, ताकि चुनाव में जनता वोट से हरा न सके। अपने ऊपर लगे आरोप का जवाब नहीं है, तो विपक्ष की तरफ से आए एक दो बयान के ज़रिए विपक्ष पर हमला किया जा रहा है कि वह रिजीम चेंज करना चाहता है, जैसे इसके लिए विपक्ष ने वोट चोरी की हो।
हर नेता ने संवैधानिक तरीके से प्रदर्शन की बात की, तो आपने जंतर-मंतर को हमेशा के लिए बंद कर दिया। तो ड्रामा से एक वास्तविक मुद्दे का काउंटर तैयार हुआ है, लेकिन इससे चुनाव आयोग की साख बहाल नहीं होगी। वोट चोरी लोकतंत्र की हत्या है। उसकी आत्मा पर प्रहार है। अब उस आत्मा को भूत-भूत कहा जा रहा है, ताकि लोग भाग जाएं।
(पत्रकारिता के क्षेत्र में कई पुरस्कारों से सम्मानित रवीश कुमार एनडीटीवी इंडिया के संपादक थे।)
