परदेश में मानव गरिमा का जाप, देश में मनु का उत्पात !
डाक्साब के न्यूयॉर्क प्रबोधन के एक अंश को मीडिया, खासतौर से सोशल मीडिया, पर कुछ ज्यादा ही सनसनीखेज माना गया। इसमें उन्होंने कहा बताया गया कि “अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा …. ।” कईयों ने तो इसे मुसलमानों की रेहड़ी, खोमचे उलटने, उनकी रसोइयों में झाँकने और मस्जिदों के सामने ढोल बजाने के ‘पुण्य कार्य’ में डटे रणबाँकुरे संघियों के दिल टूट जाने वाला कथन तक मान लिया। बाकी तो जानते ही हैं, संघी भी अच्छी तरह जानते हैं कि ये अमरीका में दिखाने के दांत हैं : खाने के दांत तो वे यहीं काम पर लगाकर गए हैं।
यही पोंजी स्कीम दलित, आदिवासी, महिलाओं और दिमाग का इस्तेमाल करने वालों के लिए है। मगर उसे हू-ब-हू मुस्लिम या ईसाइयों या बौद्धों या सिखों पर लागू करना मुश्किल है, क्योंकि हिन्दू न होने के चलते वे मनुस्मृति के दायरे में नहीं आते। इसलिए इसका ज्यादा नोटिस न जिनके बीच में बोला गया था, उन्होंने लिया, ना हीं बाकियों को लेना चाहिए।
यह बात इसलिए और ज्यादा दिलचस्प थी कि ठीक जिस समय वे उधर न्यूयॉर्क में यह तत्वज्ञान दे रहे थे कि “जाति या समुदाय के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव करना आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है।“ ठीक उसी समय इधर जम्बूद्वीपे भारतखंडे में उन्हीं के लोग मनु की कपास ओटने के अपने परम्परागत काम में पूरे प्राणपण से जुटे हुए थे। उनकी यात्रा शुरू होने के पहले मने 15 अगस्त के दिन गाँव-गाँव से ख़बरें आ रही थीं कि दलित, महिला और आदिवासी समुदायों वाले सरपंचों को झंडा नहीं फहराने दिया जा रहा, कि आज भी न जाने कितने सरपंच शिकायत करते रहते हैं कि उन्हें उनके ही दफ्तर में उनकी ही कुर्सी पर नहीं बैठने दिया जाता। उन्ही के आनुषांगिक संगठन भाजपा की एक विधायिका शिकायत कर रही थीं कि उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में बन रहे एक मंदिर में उन्हें मंदिर की ईंट तक नहीं छूने दी गयी। यह बात सिर्फ नीचे-नीचे या कुछ अनाम और छोटे-मोटे पदों वालों तक सीमित नहीं थी : संसद के उच्च सदन में प्रतिपक्ष के नेता और वरिष्ठ राजनेता मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी में हुयी आमसभा के बाद पूरे मंच और मैदान का यज्ञ और गंगाजल से शुद्धिकरण किया जा रहा था – क्योंकि खरगे दलित समुदाय से आते हैं।
ऐसा नहीं है कि डाक्साब और उनके संघ के उच्च पदाधिकारियों ने यह सब नहीं पढ़ा है। मगर उनका मिशन धार्मिक है ही कहाँ, वह तो शुद्ध राजनीतिक है और उसके लिए उनके मार्गदर्शक, पथप्रदर्शक कौन है, यह मुसोलिनी और हिटलर से मिलकर लौटे डॉ. मुंजे की डायरी में दर्ज है, सावरकर लिखित हिंदुत्व और गोलवलकर लिखित ‘हम और हमारी राष्ट्रीयता’ “और बंच ऑफ़ थॉट” में लिपिबद्ध है।
R.D Shende
मुख्य संपादक
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